अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जब विश्व के कई देशों के उत्पादों व सेवाओं पर आयात शुल्क बढ़ाया, तो ऐसे देशों में उनका बड़े पैमाने पर विरोध किया जाने लगा. मेरे समझ से टैरिफ को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का विरोध बिल्कुल गलत था और है भी.
आखिर अमेरिकी राष्ट्रपति अपने देश के संरक्षक हैं, और उन्हें अपने देश के हितों से सम्बंधित किसी भी निर्णय की स्वतंत्रता है; विशेषकर व्यापार के मामले में यदि वे इस प्रकार के निर्णय लेते हैं, तो वह उनका अधिकार है और किसी को उनसे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. टैरिफ में बदलाव मात्र तभी गलत माना जा सकता है जब किसी ऐसी डील की टैरिफ में बदलाव किया जाए जो उनकी सरकार द्वारा पहले से की जा चुकी हो.
टैरिफ को लेकर उनके तर्क पूरी तरह से जायज हैं. उन्होंने कहा है कि जिन देशों से उन्हें व्यापारिक घाटा है, उन्हें उस व्यापारिक घाटे को बराबर करना है. यह पूर्णतया एक आर्थिक निर्णय है और सर्वथा उचित भी है.
अब जो लोग, अथवा राष्ट्र, ट्रंप के टैरिफ को आपने ऊपर एक अनावश्यक और जबरदस्ती का किया गया प्रहार मानते हैं, असल में यह उनकी व्यक्तिगत समस्या है.
आखिर जब अमेरिका आपके उत्पाद नहीं चाहता या उससे अधिक टैक्स की मांग करता है, तो आपको चाहिए कि या तो आप अपने उत्पाद व सेवाओं की दरें घटाएं, जिसमें या तो आपको अपने मुनाफे से समझौता करना पड़े या फिर व्यापार बंद करना पड़े अथवा आप अमेरिका के बजाय अन्य देशों से व्यापार करें; यह उन देशों व उनके व्यापारियों की समस्या है न कि अमेरिका की जिम्मेदारी, कि वह ऐसे देशों के लालन पालन के लिए अपना स्वयं का आर्थिक नुकसान करे.
कोई भी व्यक्ति डील थोपने, या फिर अपने मुनाफे को सुरक्षित करने के लायक तभी होता है, जब वह इतना सक्षम हो, कि सामने वाला उसकी डील को ठुकरा न सके. जो सक्षम होता है, वही किसी भी डील को अपने पक्ष में कर सकता है. नहीं तो किसी सक्षम के सामने गिडगिडाने और हाथ फैलाकर डील मांगने के अलावा कोई चारा नहीं रहता. फिर आपके सामने वाला आपके ऊपर यदि तरस खा जाए तो ही आप उससे कुछ हासिल कर सकते हैं अन्यथा आप प्रतिस्पर्धा से बाहर ही होंगे.
जो भी व्यक्ति अथवा देश अपने को सक्षम बनाता है उसकी ओर सभी देखते हैं अथवा देखने को विवश भी होते हैं.
वर्तमान में दुनिया के बहुत से देश आर्थिक व सैन्य सहायता के लिए अमेरिका की ओर देखते हैं. आखिर वे अपने को स्वयं के प्रयासों से इतना काबिल क्यों नहीं बनाने का प्रयास करते, कि अमेरिका भी उनके महत्व को समझने के लिए बाध्य हो जाए और वह भी उनके साथ बराबरी का तालमेल बैठाकर आगे बढ़े.
अमेरिका ने चीन पर भी टैरिफ बढ़ाने की बात कही थी. परन्तु चीन के ऊपर टैरिफ का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, जिसका मात्र एक ही कारण है, कि चीन ने लगातार अपने को लगभग सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ने का लगातार प्रयत्न किया, और उसने उसमें उत्कृष्टता भी हासिल की. चीन ने अपनी विकास यात्रा को आगे बढ़ाने के लिए यथा संभव उन सभी विकसित देशों की टेक्नोलॉजी हासिल करने का प्रयास किया जो उसे चाहिए थी. और उसने बड़ी तीव्र गति से अपने को विकास के उस स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया, कि वह विश्व के लगभग सभी देशों से व्यापारिक डील अपने पक्ष में अथवा अपने अनुसार करने की हालत में है.
अपने को सक्षम बनाने के लिए सिंगापुर, रूस और चीन जैसा समर्पण पूरे विश्व के लिए एक प्रेरणा स्रोत है, साथ ही अपने को विभिन्न महत्वपूर्ण क्षेत्रों में तकनीकी रूप से उन्नति कैसे हासिल की जा सकती है, इसके लिए यूरोप, इजराइल, अमेरिका और रूस जैसे देश पूरे विश्व के मार्गदर्शक हैं.
सिंगापुर और चीन ने यूरोप, अमेरिका, रूस और कुछ हद तक जापान में विकसित की गई तकनीकी को अपनाकर उनका बेहतर उपयोग भी किया, साथ ही हासिल की हुई तकनीकी में नवाचार करके अपने को आर्थिक रूप से इतना सक्षम बनाया है कि दुनिया उनसे लाभान्वित भी हो रही है.
इजराइल, अमेरिका और इरान युद्ध के समय जब विश्व के कई देश ऊर्जा संकट से दो – चार हैं तब चीन, सिंगापुर और रूस जैसे देशों पर इसका कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ रहा है. रूस तो नाटो देशों के षड्यंत्र से कई मोर्चों पर पहले से ही घिरा हुआ है, फिर भी वह ऊर्जा जरूरतों के लिए परेशान नहीं है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सत्ता सम्हालने के उपरान्त कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं, जो पूरी तरह से उनके अपने देश अमेरिका के हितों के खातिर ही हैं.
राष्ट्रपति बनने के बाद से उन्होंने रूसी राष्ट्रपति पुतिन से संबंधों को बेहतर करने का प्रयास किया और उन्होंने यह पहले से ही भांप लिया था कि युक्रेन के कंधे पर बन्दूक रखकर यूरोपीय देश, रूस को नुकसान पहुंचाने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं.
एक ओर यूरोप के अधिकांश देश जबरन अमेरिका के संसाधनों को अनावश्यक रूप से युक्रेन युद्ध में बर्बाद करवा रहे हैं, और दूसरे जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यूरोपीय देशों से ईरान युद्ध में होर्मुज जलडमरू मार्ग खुलवाने के लिए सहयोग करने को कहा, तो उनमें से अधिकांश प्रमुख देशों ने मना कर दिया.
एक ओर यूरोपीय देश चाहते हैं कि नाटो देशों की रक्षा की जिम्मेदारी अमेरिका सम्हाले, लेकिन जब अमेरिका को उनकी आवश्यकता होती है तो वे अमेरिका से किनारा कर लेते हैं. अधिकांश यूरोपीय देशों का एक ही उद्देश्य है, कि वे अमेरिकी संसाधनों से मौज करें. लेकिन चूंकि डोनाल्ड ट्रम्प एक सफल व्यापारी भी हैं, तो स्वाभाविक रूप से वे अपने देश की संपत्ति को बर्बाद भी करने से बचने का प्रयास करते हैं. यही कारण था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिकी फंड से चलने वाले कई संगठनों से अमेरिका को बाहर कर लिया और अब उन्होंने नाटो से बाहर होने के भी संकेत दिए हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कार्यशैली दूसरों से भिन्न है. वे अपने आपको, हर देश के राष्ट्राध्यक्षों के सामने आदर्श आचरण करने का दिखावा करने का नाटक नहीं करते हैं. उनके मन में जो चल रहा होता है वे उसे बोल भी देते हैं और कई बार आवेश में कर या फिर भावनाओं में बहकर भी वे बयानबाजी कर देते हैं.
यदि ‘शांति के नोबेल’ को लेकर उनके किए गए आचरण को छोड़ दिया जाए, तो उन्होंने अधिकतर कार्य बहुत अच्छे किए हैं, जिसमें बाहरी लोगों को अमेरिका से बाहर करना भी एक प्रसंसनीय कदम है. वे नहीं चाहते कि उनके देश के संसाधनों पर बाहरी लोगों का कब्ज़ा हो, और प्रत्येक जिम्मेदार राष्ट्राध्यक्ष का यह कर्तव्य भी है.
अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का विरोध मात्र राजनीतिक कारणों से वैसा ही हो रहा है, जैसा कि भारत में CAA, NRC, और कथित किसान आन्दोलन सरकार विरोधी तत्वों द्वारा प्रायोजित था. यहाँ भी यह दिखाने का प्रयास किया गया था कि भारत के अधिकांश लोग केंद्र की मोदी सरकार से नाराज हैं. जबकि वास्तविकता उसके ठीक उलट थी. ठीक वही स्थिति अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के विरोध प्रदर्शनों की है, जिसका संचालन ऐसे लोगों द्वारा किया जा रहा है जो डोनाल्ड ट्रंप के धुर विरोधी हैं और वे राष्ट्रपति के विचारधारा से ठीक विपरीत हैं. जबकि सच तो यह है कि डोनाल्ड ट्रंप जो भी कर रहे हैं वह उनके अपने राष्ट्र हित से प्रेरित ही है.
विभिन्न देशों पर टैरिफ लगाने के दौरान उन्होंने एक बार कहा था कि “भारत के लोग आज उनसे प्यार नहीं करते, लेकिन वे जल्द ही उनसे प्यार करने लगेंगे.” उनका यह वक्तव्य बड़ा सोचा समझा वक्तव्य था. भारत में उनका विरोध उस समय इसलिए अधिक था, क्योंकि एक समय पाकिस्तान को वे अधिक तवज्जो देने लगे थे. परन्तु शायद यह उनकी एक रणनीति का एक हिस्सा था, कि जब उन्हें पाकिस्तान को चोट पहुँचानी होती है, तो वे उसे कोई ऐसा लालच देते हैं जिससे वह उनके जाल में फंस जाए. और जब वे उसका टॉयलेट पेपर की तरह इस्तेमाल कर लेते हैं, तो फिर वे उसे कमोड का रास्ता दिखा देते हैं, और उसमें उसे फ्लश कर देते हैं.
कुल मिलाकर वे जो भी काम कर रहे हैं वह देश और दुनिया के लिए बेहतर ही है. और विश्व व्यवस्था के लिए उनका समर्थन करना आवश्यक भी है.
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